शुक्रवार, अगस्त 25, 2017

दोहे


सोलहा दोहे
अब ये मत समझना कि सोलहा श्रृंगार के हैं

1
चाँद सजन नित भेजता,डिबिया भर सिंदूर।
रोज साँझ के भाल पर, खिलता झिलमिल नूर।।

2
सिंदूरी वो शाम थी,  शीतल मंद बयार।
सावन की बरसात में ,बोया हमने प्यार।।

3
आंच प्रेम की जब मिली,पिघली मन की पीर।
आँखों के रस्ते बहा,दारुण दुख का नीर।।

4
मेहँदी रची हथेलियाँ,आँखों कजरी धार।
तिलक भाल पर हो सजा ,सुघड़ लगे वो नार।।

5
झीनी-झीनी ओट से,आये हल्की धूप,
धीमी सी इस आंच से,पका गुलाबी रूप।।

6
जादू उसका यूं चला, उसके वश हर सांस।
जीना उसके बिन लगे,साँसों में ज्यों फांस।।

7
सदियों से बैचेन है,तुझ बिन मेरी सांस।
मिल जाये तेरी खबर,निकले जी की फांस।।

8
प्रेम-सूत मैं कातती, उठकर सुबहो-शाम।
चरखा तेरी याद का,धागा तेरा नाम।

9
महक तुम्हारी याद की,अंतर में ली घोल।
घट में मेरे उठ रही , तेरी प्रेम हिलोल।।

10

प्रेम पुष्प जबसे खिला,जीवन बगिया डार।
महकी-महकी सी फ़ज़ा, सुरभित है संसार।।

11
आया मौसम ये अजब,बढ़ा रूह का दर्द।
यादों को पाला पड़ा, साँस-साँस है ज़र्द।।

12
सपने मेरीे आँख के, टूटे चकनाचूर।
दिल की सरहद से रही,खुशियाँ कोसों दूर।।

13
बादल -छाता तान के, औंधी लेटी धूप।
आँचल से है ढक लिया,अपना यौवन रूप।

14

नारी सागर प्रेम का,प्रण का पर्वत ठोस,
दुनिया को ये पोसती,बनकर जीवन ओस।

15

आँखों के आँगन खड़ा ,मजबूती के साथ।
प्रेम वृक्ष की जड़ पिया, कैसे छूटे हाथ ।।

16

क्षण-क्षण में ये टूटता, पगला मेरा धीर ।
याद भरी हिल्लोर से,मुँह को आये पीर।।

आशा पाण्डेय ओझा

बुधवार, जुलाई 26, 2017

जीवन का उनवान है बेटी

जीवन का उनवान है बेटी।
मेरा  तो अभिमान है बेटी।

जब जब डूबे मन की नैया,
धीरज देता छोर है बेटी।
भरे उजाले दो -दो घर में,
तमस मिटाती भोर है बेटी।
दुःख को बाहर रोका करती,
ईश्वर का  वरदान है बेटी।

जीवन का उनवान है बेटी।
मेरा तो अभिमान है बेटी।।

 घर आले में दीप वो बाले,
लीपे चौक वो ,झटके जाले।
सींचे जल से नित वो तुलसी,
बानी से वो माँजे कलशी।
माँ के गुण हैं, रूप पिता का,
 मिश्रित सी पहचान है बेटी।

जीवन का उनवान  है बेटी।
मेरा तो अभिमान है बेटी।।

तीज, बैशाखी,वो राखी भी
वो गणगौर, छठी ,नोरातें
ब्याह ,बंदोलों की वो शोभा,
वो त्योंहारोँ की सौगातें।
मन तरू की टहनी पर बैठी,
कोयल का मधुगान है बेटी।

जीवन का उनवान है बेटी।
मेरा तो अभिमान है बेटी।।

आशा पाण्डेय ओझा

जीवन का उनवान है बेटी

जीवन का उनवान है बेटी।
मेरा  तो अभिमान है बेटी।

जब जब डूबे मन की नैया,
धीरज देता छोर है बेटी।
भरे उजाले दो -दो घर में,
तमस मिटाती भोर है बेटी।
दुःख को बाहर रोका करती,
ईश्वर का  वरदान है बेटी।

जीवन का उनवान है बेटी।
मेरा तो अभिमान है बेटी।।

 घर आले में दीप वो बाले,
लीपे चौक वो ,झटके जाले।
सींचे जल से नित वो तुलसी,
बानी से वो माँजे कलशी।
माँ के गुण हैं, रूप पिता का,
 मिश्रित सी पहचान है बेटी।

जीवन का उनवान  है बेटी।
मेरा तो अभिमान है बेटी।।

तीज, बैशाखी,वो राखी भी
वो गणगौर, छठी ,नोरातें
ब्याह ,बंदोलों की वो शोभा,
वो त्योंहारोँ की सौगातें।
मन तरू की टहनी पर बैठी,
कोयल का मधुगान है बेटी।

जीवन का उनवान है बेटी।
मेरा तो अभिमान है बेटी।।

आशा पाण्डेय ओझा

मंगलवार, जुलाई 18, 2017

ग़ज़ल

याद की और ख़्वाब की बातें।
हर घड़ी बस ज़नाब की बातें।।

अब नये लोग सोच भी ताज़ा
 हैं पुरानी हिज़ाब की बातें

प्यार के दरमियाँ लगी होने
देखिये अब हिसाब की बातें।

गंध बारूद की उड़ी इतनी,
गुम हुई  हैं गुलाब की बातें।

पढ़ लिया भी करो कभी मन को,
सिर्फ़ पढ़ते क़िताब की बातें।

आज हँसलें चलो जरा मिलके
 फिर करेंगे अज़ाब की बातें।

सूख जाएंगे जब नदी,सागर ,
बस बचेंगी फिर आब की बातें

लोग सीधे सरल बड़े हम तो,
क्या पता बारयाब की बातें।

दर्द, बेचैनियां कहेँ किससे,
कहें किसें इज़्तिराब की बातें।

अब मुहब्बत है गुमशुदा "आशा"
हर तरफ़ है इताब की बातें।

आशा पाण्डेय ओझा

शनिवार, जुलाई 15, 2017

दोहे

थम-थम  कर इक बादली, बरसी सारी रात
झुक-झुक तरुवर ने करी ,अपने मन की बात

 कोयल कूकी डाल पर, प्रीत की चिट्ठी बांच
एक पपीहा रात भर, तपा विरह की आंच

मुरझाया है फूल क्यों ,भँवरा करता जांच
दिखलाता है फिर उसें ,निज आँखों का कांच

एक कबूतर छुप गया ,ले टहनी की आड़
शायद उसकी हो गई ,घरवाली से राड़

आशा पाण्डेय ओझा
आँखों देखा हाल लिखा है मौसम का व अपने आस पास का

शनिवार, जुलाई 01, 2017

श्याम सखा

श्याम सखा तुम आज पधारो।
कष्ट पीर से आय उबारो।।
बाल पने  का तू है साथी।
इस जीवन की तू ही थाती।।

रक्त शिराओं में तू घुलता।
धड़कन धड़कन तू ही मिलता।।
तेरी सुधियाँ इतनी आती।
ढूँढ न निज को निज में पाती

नाम अधर पर है गोपाला।
गटकूं हर पल अमृत प्याला।।
दर्शन बिन मैं तड़पूं ऐसे।
मीन तड़पती जल बिन जैसे।।

नीर भरी हूँ बदली ऐसी।
प्रीत हुई रे तुझसे कैसी।।
दीवानी हूँ तेरी वैसी।
उस मीरा राधा के जैसी।।

नेह तनिक तू भी तो करले।
खोल भुजाएँ मुझको भरले।।
देह बदल कर जब जब आऊँ।
श्याम नाम की जोत जगाऊँ।।

आशा पाण्डेय ओझा

मंगलवार, जून 27, 2017

दोहा

खाद पड़े ज्यों याद की,पुष्पित होवे पीर।
मन खेतों को सींचता,नयन नदी का नीर।
आशा पांडे ओझा

दोहा

झील किनारे बैठ जो,लिखी चाँदनी रात।
दुनिया भर में उड़ गई,इश्क़ हुआ यह बात।।
आशा पांडेओझा

रविवार, जून 25, 2017

मधुबन एफ एम 90.4 पर

आबूरोड,माउंट आबू,सिरोही, पिंडवाड़ा, शिवगंज, सरुपगंज, सुमेरपुर, मेहसाना, पालनपुर, व आबूरोड से 200 km के एरिया में प्रसारित होने वाला एफ. एम रेडियो मधुबन पर सुन  सकते है  आप मुझे।  राजस्थानी व हिंदी दोनों के कार्यक्रमों में।

https://archive.org/details/AshaPandeyMarwadiKavita

मधुबन 90.4 fm पर साक्षात्कार

आबूरोड,माउंट आबू,सिरोही, पिंडवाड़ा, शिवगंज, सरुपगंज, सुमेरपुर, मेहसाना, पालनपुर, व आबूरोड से 200 km के एरिया में प्रसारित होने वाला एफ. एम रेडियो मधुबन पर सुन  सकते है  आप मुझे।  राजस्थानी व हिंदी दोनों के कार्यक्रमों में।
https://archive.org/details/AshaPandeyInterview

जिंदगी में अब तलक तेरी मुहब्बत के माने लिए बैठे हैं

जिंदगी में  अब तलक तेरी मुहब्बत के माने लिए बैठे हैं
यही वजह है कि आँखों में अश्कों के पैमाने लिए बैठे हैं
सुना है कि तेरी हर बहार पुरबहार है जिंदगी के चमन में
और इक हम हैं कि आज तलक साये में वीराने लिए बैठे हैं
आशा पाण्डे ओझा

शुक्रवार, जून 23, 2017

संभल लड़की

संभल लड़की

सोहलवां बसंत
आँखों में ताज़े सतरंगी सपने
करवट बदलता मन का मौसम
एकम से पूनम की और बढ़ता
रूप रंग का चाँद
आस-पास की तारावलियों को मात देकर
सुन्दर और सुन्दर प्रतीत होने को 
क्षण-क्षण निखारता खुद को
उड़ान को उतावले मन पंख
बेरोक बहती अल्हड़ नदी सी मासूम हंसी 
बेखबर इस बात से कि
उमड़-घुमड़ रहे हैं आस-पास
आवारा बादल
ठन्डे-ठन्डे अहसासों के
तेरी गर्म देह पिघलाने को
संभल लड़की

पुरुष गिद्द दृष्टि

पुरुष गिद्द दृष्टि

ज़िन्दगी जीने की चाह
कुछ पाने की ख्वाहिश
आँखों के सुनहले सपने
इक नाम, मुकाम की ज़िद्द
अटूट आत्मविश्वास 
यही कुछ तो लेकर निकली थी 
वह ख्वाहिशों के झोले में

किसी ने नहीं देखी
उसके सपने भरे आँखों की चमक
किसी को नज़र नहीं आया
उसका अटूट आत्मविश्वास
किसी ने नहीं नापी
उसकी लगन की अथाह गहराई

माने  भी नहीं किसी के लिए
उसकी भरसक मेहनत के
उसके चारों ओर फ़ैली हुई है
एक पुरुष गिद्द दृष्टि
जो मुक्त नहीं हो पा रही
आज भी उसकी देह के आकर्षण से
वह  लड़ रही है लड़ाई
देह से मुक्त होने को

हावी है जब तक पुरुषार्थ

हावी है जब तक पुरुषार्थ

देह दिखाना
तुम्हारा धर्म
गगन परिधान भी
तुम्हारा ही धर्म

पाप
स्त्री देह से
खिसकना दुप्पटा भी
धर्म,अर्थ,काम
तीनों पर हावी

जब तक पुरुषार्थ है
स्त्री कभी अहिल्या
कभी सीता कभी द्रोपदी
बनाई जाएगी पत्थर
कभी होगा चीर हरण
कभी होगी ज़मींदोज़द

चीख स्त्री चीख

चीख स्त्री चीख

क्यों हो मौन
कौन सी साध साधने को रखा है
यह अखंड मौन व्रत तूने स्त्री ?
अब तोड़ तेरा ये मौन व्रत
और चीख स्त्री
क्या पता तुम्हारी चीख
अंधी बंजर आँखों में रौशनी उगा दे
जो देख पाने में सक्षम नहीं

तेरे साथ पग-पग पर
होता हुआ अन्याय
क्या पता तुम्हारी चीख
छील दे उन कानों में उगा 
मोटी परतों का  बहरापन
जो सुन नहीं पाता तेरा क्रन्दन

हो सकता है तेरी चीख जरुरी हो
इस सृष्टि की जमीं पर
तेरी चुप्पी के बीज
व तेरे आंसूओं की बरसात से
उपजी पीड़ा की फसल काटने के लिए
क्या पता तुम्हारी चीख
पशुत्व की ओर बढती हुई आत्माओं  को
पुन:घेर लाये मनुष्यत्व की ओर
क्या पता तुम्हारी इसी चीख से बच जाये
तुम्हारा अस्तित्व
इस अनंत चुप्पी में डूबी हुई
भोगेगी कब तक
यह भयावह संत्रास!

चुप्पी की इस शय्या पर लेटी
तुम जीने की कामना से वंचित
एक लाश सी लगती हो 
तुम्हारी चुप्पी का यही अर्थ लगाता है पुरुष
कि तुम हो सिर्फ़ भोग विलासिता की वस्तु भर हो
दर्ज कराने को अपने अस्तित्व की मौजूदगी   
तोड़ अंतहीन मौन
उधेड़ अपने होठों की  सिलाई
जो जरा सी खुलते ही फिर सीने लगते हैं
 बता कब तक नहीं उतरेगी
तूं अपने अंतःस्थल में
और कितने युगों तक न होगा तुझको स्व का भान
चल खुद के लिए न सही इस सृष्टि के लिए ही बोल
तुम्हारी चीख जरुरी है
बचे रहने को स्त्री
बची रहने को पृथ्वी

गुरुवार, जून 22, 2017

दोहा

बोझा लादे दर्द का , मन का यह मजदूर ।
 पूछ रहा है जिंदगी , चलना कितना दूर ।।
जीवन माथा फोड़ी साहब
पल पल एक हथौड़ी साहब

चैन नहीं है दम भर इनको
साँसे फिरती दौड़ी साहब

रिश्ते  नाटक ऐसे करते
बिगड़ी जैसे घोड़ी साहब

अपने मन की सबने करली
कसर नहीं कुछ छोड़ी साहब

छोड़ ख़ुशी पल में भग जाती
ग़म से इसकी जोड़ी साहब

दुख का ट्रैफिक सुख को रोके
 किस्मत कर दो चौड़ी साहब

नियम बना दो कुछ तो दुख के
हद ही इसने  तोड़ी साहब

जोड़-जोड़ कर जोड़ा हमने
साथ न आई कौड़ी साहब

टूट-टूट  फिर से जुड़ जाती
 होती आस निगोड़ी साहब

आगे बढ़ने की जल्दी में
कितनी होड़ा-हौड़ी साहब

छोडो क्या  शिकवा भी करना
बची बहुत ही थोड़ी साहब

छुटकारा मिल जाये इससे
जाऊं हरकी पौड़ी साहब

आशा पाण्डेय ओझा

शुक्रवार, जून 16, 2017

दोहा

तन को मीरां कर लिया,मन को किया कबीर।
बची न कोई आस फिर, बची न कोई पीर।।
आशा पांडे ओझा

बुधवार, फ़रवरी 08, 2017

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बुधवार, जनवरी 28, 2015

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1830, rue Marie-Victorin, Saint-Bruno, QC J3V 6B9

CANADA
450-404-8725

बुधवार, जनवरी 21, 2015

arrival in

T the records showed that it formerly supported a population of 3,500 people, from cultivation of the rich lands in the valley, grazing cattle, and working the silver mines. The Santa Cruz valley had been and could apparently again be made an ear

रविवार, अगस्त 03, 2014

रिक्त नहीं थी मैं

तुमने कहा
तुम अपना दर्द मुझे दो
मैं उसें ख़ुशी मैं बदल दूंगा
मान गई मैं
तुमने कहा
तुम अपने आँसूं मुझे दे दो
मैं उसें हंसीं मैं बदल दूंगा
मान गई मैं
तुमने कहा
तुम अपनी दरकन मुझे दो
उसें जुड़ाव में बदल दूंगा
मान गई मैं
तुमने कहा
तुम अपनी रिक्तता मुझे दो
भर दूंगा उसें
नहीं मानी मैं
क्योंकि
रिक्त नहीं थी मैं
नस-नस मैं थी
उसकी याद
हृदय में था
उसका कंपन
कानों में थी
उसकी गूंज
होंठों पर था
उसका नाम
आत्मा में था
उसका संचार
मुझमे था वो
रिक्त नहीं थी मैं

 पुस्तक ज़र्र- ज़र्रे में वो है से यह कविता

शनिवार, अगस्त 02, 2014


तुमने कहा
मुहब्बत में मत  भटको 
परमतत्व ढूंढो
दिन रात 
भूखी प्यासी
लगी रही ढूँढने में  
परमतत्व 
जाने कितने 
दिवस ,मास 
बरस ,युग 
बीत गए 
पर नहीं मिला 
 वो परमतत्व 
और मैं जानती हूँ 
कि वो कभी मिलेगा भी नहीं 
क्योंकि 
तुम्हारे कहे में आकर 
छोड़ जो दिया 
मैंने उस तक पंहुचने का 
सही रास्ता 
जो था सिर्फ 
और सिर्फ 
मुहब्बत 
ज़र्रे-ज़र्रे  से 
मुहब्बत 
आशा पांडे ओझा

इनके हाथ कहाँ से लगी प्रेम किताब

क्यों दहकते हैं पलाश के जंगल 
गली,घर,दरवाजे,खिड़की जंगल
दस्तक देती 
किसको ढूंढती फिरती है फाल्गुन की
ये बावरी हवाएं 
फूलों की खातिर उलझ-उलझ कर काँटों से
क्यों जख्मी हो जाती है रोज ही
ये पगली तितलियाँ
रेगिस्तान के सूने सीने में
हूड्ड़ हूड्ड़ कर बजता
सदियों ये किसी की याद का अंधड़
आसमां के सीने में
किसकी कमी ने भर दिया
दरिया दरिया गुब्बार
युगों से रत्ती भर भी कम न पड़ी
ये पपीहे के कलेजे में
अंबर-धरा को विगलित करती
किसके नाम की उठती है हूक
इतना तो जान पाई हूँ ये सब ही हैं प्रेमपगे
पर कहो न
इनके हाथ कहाँ से लगी प्रेम किताब ?
आशा पाण्डेय ओझा

शुक्रवार, मार्च 11, 2011

क्या तू मुझे फिर से याद करना चाहता है ....??


क्या तू  मुझे फिर से याद करना चाहता है  ....??
तू गर एक बार फिर से मुझे याद करना चाहता है तो
क्षितिज के कांधों पर सर रखकर-
 रोते हुए व्याकुल वसुंधरा को देखना!
सावन के घनी मेघों की छाया में चुपके चुपके-
नीरवता में रोती हुई रात को देखना!
सबसें नज़र चुराकर ,निर्जन रास्तों पर-
कुछ ढूंढते हुए प्रभात को देखना!
बिछड़ती   हुई रात के सीने पर
सर गड़ाते हुए चाँद को देखना ! 
लौटती हुई चांदनी के गीत
अपनी पंखुड़ियों में समटते हुए
किसी कँवल को देखना!
निश्चय  मान तेरा मन अतिशय वेदना से भर आएगा|
मन के सारे अवरुद्ध कोष फूट पड़ेंगे -
तेरे रिक्त हृदय में फिर से प्रेम राग भर आएगा |
तेरे स्वर पहले ही की तरह सुबकने लगेंगे -
तू अगर अब तलक पत्थर भी हो चूका होगा तो आंसुओं सा पिघल जायेगा |
 और मुझे यकीं है तूँ फिर से मुझे ढूंढने  निकल पड़ेगा 
और मुझे उसी पल का इन्तजार है ...
दुःख  की इन चिर करुण घड़ियों से मुक्त पल भर होकर-
फिर से नए दर्दो गम के अहसासों में डूबने के लिए 
इन्तजार ...इन्तजार ...इन्तजा

रविवार, मार्च 28, 2010

अंधी हो गई

मूल्य लालटेन का
नहीं जुटा पाई
जब वह
बेचती गई
खुद को
रोशनी की खातिर
अंधी हो गई
मेरी पुस्तक "वक्त की शाख पे "से

नही करती व्यक्त

नही करती व्यक्त

प्रतिक्रिया

अब किसी भी बात पर

शायद ये खबर है

मेरे पागल होने की

मेरी पुस्तक "वक्त की शाख पर "से

ओ ह्रदय!


ओ हृदय !
लड़ो मस्तिष्क से
रखो उसें निज अधीन
मस्तिष्क का तुम पर आधिपत्य
बना देगा ,सृष्टी सवेंदनहीन

मेरी पुस्तक "वक्त की शाख पे "

दुछत्ती सा मन

घर की दुछत्ती सा निरंतर अथाह अनंत दुखों का बोझ ढोता है मन

ज़िंदगी फ़िर भी करती है कोशिश बैठक की तरह मुस्कराने की

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

रविवार, मार्च 21, 2010

ग़ज़ल


ग़ज़ल 
हर एक लफ्ज़ में ग़म अपना ढाल लेते हैं 
हर इक वरक पर कलेजा निकाल लेते हैं 
हम जानते हैं ये पहलू भी दोनों तेरे ही हैं 
सुकून भर को ये सिक्का उछाल लेते हैं 
अजीब शोर है अहसास का मेरे दिल में 
गुब्बारे दिल से ये सागर निकाल लेते हैं
 ज़हर पियेगा भला कौन इन हवाओं का 
मिज़ाजे शिव की तरह खुद में ढाल लेते हैं
तेरी बेवफ़ाई पे यकीं करें तो मर ही जायें शायद 
यह ख़याल ही दिल से निकाल लेते हैं 
ये दर्दो -ग़म भी कहाँ ख़त्म होंगे आशा के 
ले ज़िन्दगी तुझे बस इक सवाल देते हैं