रविवार, मार्च 28, 2010

अंधी हो गई

मूल्य लालटेन का
नहीं जुटा पाई
जब वह
बेचती गई
खुद को
रोशनी की खातिर
अंधी हो गई
मेरी पुस्तक "वक्त की शाख पे "से

नही करती व्यक्त

नही करती व्यक्त

प्रतिक्रिया

अब किसी भी बात पर

शायद ये खबर है

मेरे पागल होने की

मेरी पुस्तक "वक्त की शाख पर "से

ओ ह्रदय!


ओ हृदय !
लड़ो मस्तिष्क से
रखो उसें निज अधीन
मस्तिष्क का तुम पर आधिपत्य
बना देगा ,सृष्टी सवेंदनहीन

मेरी पुस्तक "वक्त की शाख पे "

दुछत्ती सा मन

घर की दुछत्ती सा निरंतर अथाह अनंत दुखों का बोझ ढोता है मन

ज़िंदगी फ़िर भी करती है कोशिश बैठक की तरह मुस्कराने की

मेरी पुस्तक "एक कोशिश रोशनी की ओर "से

रविवार, मार्च 21, 2010

ग़ज़ल


ग़ज़ल 
हर एक लफ्ज़ में ग़म अपना ढाल लेते हैं 
हर इक वरक पर कलेजा निकाल लेते हैं 
हम जानते हैं ये पहलू भी दोनों तेरे ही हैं 
सुकून भर को ये सिक्का उछाल लेते हैं 
अजीब शोर है अहसास का मेरे दिल में 
गुब्बारे दिल से ये सागर निकाल लेते हैं
 ज़हर पियेगा भला कौन इन हवाओं का 
मिज़ाजे शिव की तरह खुद में ढाल लेते हैं
तेरी बेवफ़ाई पे यकीं करें तो मर ही जायें शायद 
यह ख़याल ही दिल से निकाल लेते हैं 
ये दर्दो -ग़म भी कहाँ ख़त्म होंगे आशा के 
ले ज़िन्दगी तुझे बस इक सवाल देते हैं