रविवार, मार्च 21, 2010

ग़ज़ल


ग़ज़ल 
हर एक लफ्ज़ में ग़म अपना ढाल लेते हैं 
हर इक वरक पर कलेजा निकाल लेते हैं 
हम जानते हैं ये पहलू भी दोनों तेरे ही हैं 
सुकून भर को ये सिक्का उछाल लेते हैं 
अजीब शोर है अहसास का मेरे दिल में 
गुब्बारे दिल से ये सागर निकाल लेते हैं
 ज़हर पियेगा भला कौन इन हवाओं का 
मिज़ाजे शिव की तरह खुद में ढाल लेते हैं
तेरी बेवफ़ाई पे यकीं करें तो मर ही जायें शायद 
यह ख़याल ही दिल से निकाल लेते हैं 
ये दर्दो -ग़म भी कहाँ ख़त्म होंगे आशा के 
ले ज़िन्दगी तुझे बस इक सवाल देते हैं 

4 टिप्‍पणियां:

  1. तेरी बेवफ़ाई पे यंकी करते तो मर जाते हम
    जीने की ख़ातिर तूं बावफ़ा वहम पाल लिया मैंने..
    बहुत खूब .... आशा जी."शुभ"

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  2. vaham na ho to jindagi katani muskil ho jaye .,
    shiv mile na mile , jahar khatm ho jaye .
    lajabab rachna

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  3. जानती हूं हेड -ओ -टेल सब तेरी ही मर्जी है
    सिर्फ सुकूं खातिर सिक्का उछाल लिया मैंने ....

    शब्दों का अच्छा प्रयोग ... सुंदर रचना

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